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वह स्कूल कहाँ से लायें… जो…

golgappa panipuri वह स्कूल कहाँ से लायें... जो...

गोलगप्पा (पानीपूरी)

जगदलपुर. आज कल स्कूलों में पैसे कमाने की जैसे होड़ सी लगी हुई है. हम बात कर रहे है शहर के स्कूलों में लगने वाले “आनंद मेले” की, जिसमे “आनंद” के नाम पर सीधा लूट खसोट किया जा रहा है. पखवाड़े भर पहले लगे मेले की मैं बात कर रहा हूँ, जिसमे लगभग सभी नामचीन स्कूलों ने विद्यार्थियों में सहयोग की भावना जगाने के उद्येश से “आनंद मेले” का आयोजन किया था. जिसमे ऊँची कीमतों पर बाज़ार में बिकने वाले छोटे से छोटे आइटमो को बेचा गया.

एक नज़र डालें खाद्य सामग्रियों की कीमत पर – बाज़ार में बिकने वाला रु. 5/- का गोलगप्पा (पानीपूरी) यहाँ रु. 10/- में बिका … सोचने वाली बात तो यह है की एसी कौन सी मजबूरी थी जिसे पालक इन खाद्य सामग्रियों को दुगने दामो में भी बच्चो को खरीद कर देने के लिए तैयार हो गए. वहीं समोसा, आइसक्रीम, डोसा, केक इत्यादि की कीमतें भी आसमान छू रही थी.

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भारतियों में बसी एक अद्भुत कला – “मेहमान नवाजी”

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मेहमान नवाजी

आज मेरे फेसबुक के वॉल पर मैंने इस तस्वीर को देखा, इसमें लिखे वाक्यों को देखकर पहले तो खूब हँसा फिर बाद में सोचा की क्या वाकई भारत की मेहमान नवाजी, दुनिया के सभी जगहों से अच्छी है ? क्या हमारे यहाँ वाकई “मेहमान” शब्द को भगवान् का दर्जा दिया जाता है ?

भारत में प्रचलित एक पुरानी कहावत है “मेहमान, भगवान् का रूप होता है.”. मेरे घर, प्रत्येक एक-दो दिनों के अंतराल में कोई न कोई मेहमान आ धमकता है. अगर वह मेहमान कोई करीबी हो तो मुझे और मेरे परिवार के सदस्यों को उनकी खातिरदारी करने में बड़ा मज़ा आता है क्यूंकि वे हमारी आदतों से लगभग परिचित होते हैं, किन्तु अगर कोई नया व्यक्ति आ धमके तो हमें अपने ही घर में अकेला सा महसूस होने लगता है. पर विद्वानों द्वारा यह बात भी सही कही गई थी की “किसी के घर ज्यादा जाने से हमारी ही इज्ज़त कम हो जाती है”, पर प्रत्येक घर आने वाला मेहमान यह नहीं समझता.

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जब आइन्स्टीन बने ड्राईवर…

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अल्बर्ट आइन्स्टीन (1879-1955)

अल्बर्ट आइन्स्टीन (1879-1955) को कौन नहीं जानता ? वे एक महान वैझानिक थे. उनकी खोज के कारण ही न्यूक्लियर एनर्जी, स्पेस ट्रेवल , और टेलीविज़न जैसे खोजो में अपार सफलता मिली. आइंस्टीन को हल्के मजाक बहुत पसंद थे. उनमे सेन्स-आफ-ह्यूमर गजब का था.

बात उन दिनों की है जब आइंस्टीन लोकप्रिय हो रहे थे और उनको अलग-अलग कालेजों में आख्यान देने के लिए बुलाया जा रहा था और वे आख्यान देते हुए विभिन्न कालेजों में जाया करते थे. हर बार वे अपने चेहते ड्राईवर हेंस को ले जाया करते थे, वह ड्राईवर अक्सर कहता था – “एक जिनिअस को में चलाता हूँ.”

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क्या वाकई इन्टरनेट युवा वर्ग की ज़िन्दगी बन चुका है … या कोई अभिशाप !!!

आजकल इन्टरनेट शब्द को कौन नहीं जानता ! शायद एक नवजात शिशु भी इस शब्द से नावाकिफ नहीं होगा. इन्टरनेट, जो आज इस तकनीकी से भरी दुनिया में फ़ैल चूका है. इन्टरनेट का इतिहास कोई खासा पुराना नहीं है, 1950 और 1960 के दशक में जब कम्प्यूटरों का जन्म हुआ था, उसी वक़्त से इन्टरनेट ने भी अपना पहला कदम रखा था.

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इन्टरनेट

रही बात मेरी तो मैंने इन्टरनेट का प्रयोग करना वर्ष 1995 से शुरू किया, उस वक़्त बहुत ही आनंदमयी जीवन हुआ करता था, दोस्तों के साथ इन्टरनेट केफे जाया करते थे, उन पुराने कम्प्यूटरों पर घंटे के 50 रुपये देकर बैठा करते थे, हमें तो यह भी पता नहीं होता था की इसे शुरू कैसे किया जाता है और ब्राउसिंग शब्द का अर्थ क्या होता है ? बस हमें तो यही पता था की दोस्तों के साथ जाना है, एक घंटे बिताने हैं और बस हॉट हिरोइनों के तस्वीर देखने है, शादी तो हुई नहीं थी, और ऊपर से जवानी भी अपने शुमार पर थी… (व्यंग्य)

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